जीवन की मौलिक इकाई: एक सूक्ष्म यात्रा By Praveen Kumar Sahu

जीवन की मौलिक इकाई: एक सूक्ष्म यात्रा By Praveen Kumar Sahu

 

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जैसे ही विहान ने अपनी विज्ञान की किताब का अध्याय 5, "जीवन की मौलिक इकाई" खोला, पन्नों के बीच से एक नन्हीं, चमकती हुई आकृति उभरी। वह एक छोटी सी परी जैसी थी, जिसका शरीर पारदर्शी था और उसके भीतर रंगीन रोशनी चमक रही थी। "नमस्ते विहान! मैं हूँ सायटा," उसने चहकते हुए कहा। "तुमने सितारों और तत्वों को देखा है, लेकिन क्या तुमने कभी उस ईंट को देखा है जिससे तुम खुद बने हो? चलो, मैं तुम्हें कोशिका की जादुई दुनिया में ले चलती हूँ 


 सायटा ने विहान को एक पुराने समय के लकड़ी के माइक्रोस्कोप के पास ले गई। "1665 में, रॉबर्ट हुक ने काग (cork) की एक पतली काट को देखा था," सायटा ने समझाया। विहान ने लेंस के अंदर झाँका, जहाँ उसे मधुमक्खी के छत्ते जैसे छोटे-छोटे कमरे दिखाई दिए। सायटा ने मुस्कुराते हुए कहा, "हुक ने इन छोटे कमरों को 'सेल' यानी 'कोशिका' कहा। लैटिन में इसका अर्थ होता है 'छोटा कमरा'। यही जीवन की शुरुआत है।"

 

सायटा विहान को कोशिका के ठीक बीचों-बीच ले गई, जहाँ एक विशाल, चमकता हुआ गोला था। "यह 'केंद्रक' (Nucleus) है, कोशिका का मुख्यालय," सायटा ने गर्व से कहा। विहान ने देखा कि उसके अंदर धागे जैसी उलझी हुई संरचनाएं थीं। "इन्हें क्रोमेटिन कहते हैं। इन्हीं में डीएनए (DNA) होता है, जिसमें तुम्हारे शरीर को बनाने और चलाने के सारे निर्देश छिपे हैं। यह कोशिका का मस्तिष्क है।"

 

 





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